Wednesday, 7 October 2015


दाराशिकोह
क्य आप जानते हैं , दाराशिकोह को उपनिषदों का ज्ञान औलिया सरद से मिला था ?
दाराशिकोह उपनिषदों को फारसी में अनुबाद कराया और उपनिषद भारत से चल कर पश्चिम में पहुंचे / पहली बार जब पश्चिम के लोग उपनिषदों को पढ़ा तो हैरान हो उठे / उपनिषद की भाषा नेती - नेती कि भाषा है / दार्शनिक , वैज्ञानिक एवं ऋषि तीन प्रकार के लोग हैं जो ज्ञान की ओर यात्रा पर होते हैं और चाहते हैं कि सभीं लोग ज्ञान से सत्य को देखें / दार्शनिक और वैज्ञानिक बुद्धि केन्द्रित होते हैं और उनके पास तर्क – वितर्क की गहरी क्षमता होती है लेकिन ऋषि की यात्रा भिन्न होती है / ऋषि तर्क – वितर्क में नहीं उलझता उसके पास श्रद्धा की ऊर्जा होती है जहाँ संदेह के लिए कोई जगह नहीं
होती 
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दारा शिकोह मुमताज महल के गर्भ से उत्पन्न मुगल सम्राट् शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र जो 20 मार्च, 1615 को उत्पन्न हुआ। 1633 में युवराज बनाया गया और उसे उच्च मंसब प्रदान किया गया। 1645 में इलाहाबाद, 1647 में लाहौर और 1649 में वह गुजरात का शासक (गवर्नर) बना। 1653 में कंधार में हुई पराजय से इसकी प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। फिर भी शाहजहाँ इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखता था, जो दारा के अन्य भाइयों को स्वीकार नहीं था। शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर औरंगजेबऔर मुराद ने दारा के धर्मद्रोही होने का नारा लगाया। युद्ध हुआ। दारा दो बार, पहले आगरे के निकट सामूगढ़ में (जून, 1658) फिर अजमेर के निकट देवराई में (मार्च, 1659), पराजित हुआ। अंत में 10 सितंबर, 1659 को दिल्ली में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी। दारा का बड़ा पुत्र औरंगजेब की क्रूरता का भाजन बना और छोटा पुत्र ग्वालियर में कैद कर दिया गया।
सूफीवाद और तौहीद के जिज्ञासु दारा ने सभी हिंदू और मुसलमान संतों से सदैव संपर्क रखा। ऐसे कई चित्र उपलब्ध हैं जिनमें दारा को हिंदू संन्यासियों और मुसलमान संतों के संपर्क में दिखाया गया है। वह प्रतिभाशाली लेखक भी था। "सफीनात अल औलिया" और "सकीनात अल औलिया" उसकी सूफी संतों के जीवनचरित्र पर लिखी हुई पुस्तकें हैं। "रिसाला ए हकनुमा" (1646) और "तारीकात ए हकीकत" में सूफीवाद का दार्शनिक विवेचन है। "अक्सीर ए आजम नामक उसके कवितासंग्रह से उसकी सर्वेश्वरवादी प्रवृत्ति का बोध होता है। उसके अतिरिक्त "हसनात अल आरिफीन" और "मुकालम ए बाबालाल ओ दाराशिकोह" में धर्म और वैराग्य का विवेचन हुआ है। "मजमा अल बहरेन" में वेदांत और सूफीवाद के शास्त्रीय शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत है। 52 उपनिषदों का अनुवाद उसने "सीर-ए" अकबर में किया है।
हिंदू दर्शन और पुराणशास्त्र से उसके संपर्क का परिचय उसकी अनेक कृतियों से मिलता है। उसके विचार ईश्वर का श्विक पक्ष, द्रव्य में आत्मा का अवतरण और निर्माण तथा संहार का चक्र जैसे सिद्धांतों के निकट परिलक्षित होते हैं। दारा का विश्वास था कि वेदांत और इस्लाम में सत्यान्वेषण के सबंध में शाब्दिक के अतिरिक्त और काई अंतर नहीं है। दारा कृत उपनिषदों का अनुवाद दो विश्वासपथों - इस्लाम और वेदांत - के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान है।
राजनीतिक परिस्थितियों वश दारा में नास्तिकवाद की ओर रुचि हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। बाल्यकाल से ही उसमें अध्यात्म के प्रति लगाव था। यद्यपि कुछ कट्टर मुसलमान उसे धर्मद्रोही मानते थे, तथापि दारा ने इस्लाम की मुख्य भूमि को नहीं छोड़ा। उसे धर्मद्रोही करार दिए जाने का मुख्य कारण उसकी सर्व-धर्म-सम्मिश्रण की प्रवृत्ति थी जिससे इस्लाम की स्थिति के क्षीण होने का भय था।
जागतिक सहिष्णुता और भारत में हिंदू मुस्लिम एकता में उसने अटूट विश्वास प्रकट किय। इन तत्वों को उसने सदेव धार्मिक प्रपंचों के ऊपर माना।
दारा शिकोह मुमताज महल के गर्भ से उत्पन्न मुगल सम्राट् शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र जो 20 मार्च, 1615 को उत्पन्न हुआ। 1633 में युवराज बनाया गया और उसे उच्च मंसब प्रदान किया गया। 1645 में इलाहाबाद, 1647 में लाहौर और 1649 में वह गुजरात का शासक (गवर्नर) बना। 1653 में कंधार में हुई पराजय से इसकी प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। फिर भी शाहजहाँ इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखता था, जो दारा के अन्य भाइयों को स्वीकार नहीं था। शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर औरंगजेबऔर मुराद ने दारा के धर्मद्रोही होने का नारा लगाया। युद्ध हुआ। दारा दो बार, पहले आगरे के निकट सामूगढ़ में (जून, 1658) फिर अजमेर के निकट देवराई में (मार्च, 1659), पराजित हुआ। अंत में 10 सितंबर, 1659 को दिल्ली में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी। दारा का बड़ा पुत्र औरंगजेब की क्रूरता का भाजन बना और छोटा पुत्र ग्वालियर में कैद कर दिया गया।
सूफीवाद और तौहीद के जिज्ञासु दारा ने सभी हिंदू और मुसलमान संतों से सदैव संपर्क रखा। ऐसे कई चित्र उपलब्ध हैं जिनमें दारा को हिंदू संन्यासियों और मुसलमान संतों के संपर्क में दिखाया गया है। वह प्रतिभाशाली लेखक भी था। "सफीनात अल औलिया" और "सकीनात अल औलिया" उसकी सूफी संतों के जीवनचरित्र पर लिखी हुई पुस्तकें हैं। "रिसाला ए हकनुमा" (1646) और "तारीकात ए हकीकत" में सूफीवाद का दार्शनिक विवेचन है। "अक्सीर ए आजम नामक उसके कवितासंग्रह से उसकी सर्वेश्वरवादी प्रवृत्ति का बोध होता है। उसके अतिरिक्त "हसनात अल आरिफीन" और "मुकालम ए बाबालाल ओ दाराशिकोह" में धर्म और वैराग्य का विवेचन हुआ है। "मजमा अल बहरेन" में वेदांत और सूफीवाद के शास्त्रीय शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत है। 52 उपनिषदों का अनुवाद उसने "सीर-ए" अकबर में किया है।
हिंदू दर्शन और पुराणशास्त्र से उसके संपर्क का परिचय उसकी अनेक कृतियों से मिलता है। उसके विचार ईश्वर का श्विक पक्ष, द्रव्य में आत्मा का अवतरण और निर्माण तथा संहार का चक्र जैसे सिद्धांतों के निकट परिलक्षित होते हैं। दारा का विश्वास था कि वेदांत और इस्लाम में सत्यान्वेषण के सबंध में शाब्दिक के अतिरिक्त और काई अंतर नहीं है। दारा कृत उपनिषदों का अनुवाद दो विश्वासपथों - इस्लाम और वेदांत - के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान है।
राजनीतिक परिस्थितियों वश दारा में नास्तिकवाद की ओर रुचि हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। बाल्यकाल से ही उसमें अध्यात्म के प्रति लगाव था। यद्यपि कुछ कट्टर मुसलमान उसे धर्मद्रोही मानते थे, तथापि दारा ने इस्लाम की मुख्य भूमि को नहीं छोड़ा। उसे धर्मद्रोही करार दिए जाने का मुख्य कारण उसकी सर्व-धर्म-सम्मिश्रण की प्रवृत्ति थी जिससे इस्लाम की स्थिति के क्षीण होने का भय था।
जागतिक सहिष्णुता और भारत में हिंदू मुस्लिम एकता में उसने अटूट विश्वास प्रकट किय। इन तत्वों को उसने सदेव धार्मिक प्रपंचों के ऊपर माना।
दारा शिकोह   जब मैं सत्य को अपने सीने में महसूस करता हूँ तब समझ लेता हूँ कि हिन्दू और मुसलमान में कोई फर्क नहीं है। मैं जानता हूँ मेरी यह बात जामा मस्जिद के उलेमाओं के ह्रदय को चोट पहुँचाएगी, इसलिए यह बात हमारे बीच ही रहे, मैं यही चाहता हूँ।...
‘‘ईश्वर, इन्द्रिय, ज्योति, ग्रह, नक्षत्र के मामलों में हिन्दू मुसलमानों की सोच में विशेष कोई अन्तर नहीं है। कुरान में-नील नदी की दो शाखाएँ बताई गई हैं बाहर-उल-आवयाद और बाहर-उल-आसवाद। एक श्वेत नदी है और दूसरी नीली नदी। यह खार्तुम में आकर मिल गई है। इस मुहाने का नाम है मजमायाल-बाहरायेन। मुझे लगता है कवि की हिन्दू और मुसलमान का मुहाना है ये हिन्दोस्तान। मेरी नजरों में तो हिन्दोस्तान ही हिन्दू-मुसलमान का मजमायाल-बाहरायेन है।...

‘‘वेदों में कुरान की विशद व्याख्या है कवि। कुरान में जिस गुप्त ग्रंथ का उल्लेख है, वह ग्रन्थ है वेद। मेरा यह चिन्तन धर्मान्ध मुसलमान सहन न करेंगे। वे मुझे दोषी ठहराएँगे। लेकिन मुझे अगर पता चलता है कि एक काफिर के पाप के कीचड़ में डूबे रहने पर भी अगर उसकी आवाज में तौहीद है, एकेश्वरवाद का संगीत है तो मैं उसके पास जरूर जाऊँगा। उसका गाना सुनूँगा और इस बात के लिए कृतज्ञ होऊँगा। हिन्दू और मुसलमान दोनों के धर्म, अल्लाह के पास जाने का एक ही रास्ता बताते हैं। दोनों धर्म कहते हैं कि ईश्वर एक है। उससे बड़ा कोई नहीं।’’
अकबर की मृत्यु के बाद उनके उदार आदर्श, उनके कार्यक्रम सब अतीत बन गए। मुसलमान राजशक्ति ने हिन्दोस्तान में मुसलमानों को विशेष अधिकार दिए थे। उसके साथ धर्म के तौर पर इस्लाम जुड़ जाने से, मुसलमानों की शक्ति का प्रतीक इस्लाम, अपने पाँव पर खड़ा हो गया। अकबर का उदार आदर्श, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई....सभी धर्मों के ऊपर था। उसी आदर्श की रक्षा करने की बुद्धि जहाँगीर या शाहजहाँ जैसे साधाराण बुद्धिवाले इनसानों में नहीं थी। 

उन्हीं के वंश में एक दिखाई दिए। उन्हीं के प्रपौत्र-शाहजहाँ के पुत्र शाहज़ादा दाराशिकोह।
उनका जीवन जितना रोमांटिक था, उतना ही त्रासदीपूर्ण। रसमय होते हुए भी दर्द से टपकता हुआ जीवन। इतिहास में ऐसे चरित्र दुर्लभ ही होते हैं। उनके पास रूप था। लेकिन उनकी भावुकता में शायद उन्हें जीवन की अन्तिम दशा तक खींचकर पहुँचा दिया था। दाराशिकोह युद्ध, प्रेम, षड्यन्त्र के बीच तैरते हुए मानव धर्म को ढूँढ़ते रहे।
उन्होंने समस्त मानव समाज को प्रेम के बन्धन में बाँधकर एक अनोखा समाज बनाने का सपना देखा था। लेकिन उनके पटवारियों वाली कूटबुद्धि न होने के कारण वे जागतिक मामले में परास्त हो गए। इसीलिए हमें आज उनसे सहानुभूति है।....हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
प्राचीन इतिहास में उन्हें धर्मद्रोही घोषित किया था। अनभिज्ञ जनसाधाराण के भीतर, पुरोहितों के भीतर प्रचलित धर्म के विश्वास पर तर्क, युक्ति या उदारता जैसी चीजों का कोई स्थान नहीं है। ये लोग दूसरों के धार्मिक विचारों से घृणा करना सिखाते हैं। महात्मा दाराशिकोह उसी संकीर्ण साम्प्रदायिक प्रचलित धार्मिक विचार पर विश्वास नहीं करते थे। 
 दाराशिकोह विश्वास करते थे कि सभी धर्म मूलत: एक हैं। उचित साधना-द्वारा प्रत्येक धर्म के माध्यम से
मुक्ति मिल सकती है। मुक्ति के लिए सिर्फ़ चाहिए सत्यनिष्ठा, चित्त-शुद्धि और जन-सेवा। 

औरंगजेब की धर्मान्धता के दबाव में आकर लोग दाराशिकोह को भूलने लग गए। जबकि कुरुक्षेत्र के बाद उन्हीं की वजह से हिन्दोस्तान में महायुद्ध, इतिहास का सबसे बड़ा ग्रह युद्ध, भाइयों में अन्तर्कलह हुआ और मारकाट हुई। हिन्दोस्तान के इतिहास में अनेक घटनाएँ घटीं, अनेक राज्यों का उत्थान-पतन हुआ। लेकिन बदनसीबी दारा इन सब घटनाओं से बहुत पीछे छूट गये थे। इतिहास बड़ी-बड़ी घटनाओं को लिखता है। संस्कृति-साधना के क्षेत्र में दाराशिकोह का खामोशी से किया असामान्य कार्य और उसके परिणामों के मामले में चिरमुखर इतिहास आज गूँगा बन गया है।

दैवी अतृप्ति से दुखी दारा को उस समय के इतिहासकारों ने भी नहीं समझा और उन्हें अस्थिर चित्त इनसान कहा। धर्म के मामले में दारा के उदार विचार हिन्दोस्तान के लिए नए नहीं। उनसे पहले भी बहुत से सूफ़ी सन्तों ने ऐसी ही बातें कहीं थी। लेकिन समसाययिक मुसलमानों का सारा आक्रोश जा पड़े बेचारे दाराशिकोह पर।
अन्त में, उन्होंने एक निरीह, उदार इनसान का सिर क़लम करवाकर ही दम लिया।

असाधारण मन और विचारधारा के इस मुग़ल शाहज़ादे के प्रति मुग़लकालीन हिन्दोस्तान के इतिहासकारों ने सहानुभूति नहीं दिखाई और यही कारण है कि उनकी असली तस्वीर राजनीति के विपरीत स्रोत्र के भँवर में पड़कर विकृत हो गई। सत्य की तालाश में शाहज़ादा दारा जिस सहजता से मस्जिद में चले जाते थे उसी तरह से नि:संकोच मंदिर में भी जाते थे। ईश्वर में समा जाने के लिए प्रेमी साधक ने मंदिर-मस्जिद में कभी कोई भेदभाव नहीं किया। मैंने सिर्फ़ वही वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास मात्र किया है और जब विचित्र करने बैठा, तब उस समय के हिन्दोस्तान को देखा उस समय के लोग कई शताब्दियों से धूल-मिट्टी के नीचे दबे पड़े हैं। उसी धूल-मिट्टी को हटाने पर क्षोभ, दुख, ईर्ष्या, अभिमान, प्यार, घृणा....सब कुछ दिखाई पड़ने लगा। यथासम्भव मैंने उस समय की छवियाँ आँकने का प्रयास किया है।


रहीम,  ताज, शेष,  नजीर,  कारे खां , करीम बख्स,  इंशा बाजिंद, बुल्लेशाह, आदिल,  मकसूद, मौजीन, वाहिद , दीन दरबेश , अफ़सोस, काजिम, खलास , वहजन  , लतीफ़ हुसैन  , मंसूर , यकरंग  , कायम  , निजमिद्दीन औलिया , फरहत  , काजी अशरफ महमूद ,  आलम  , तालिब शाह , महबूब , नफीस खलीली , सईद कासिम अली , सरमद
http://hindiknolbook.wordpress.com/2011/12/10/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A6-sarmad/

सरमद (Sarmad)

सरमद मस्त मौला फकीर थे | इनका असली नाम कोई नहीं जानता | ”सरमद ” तखल्लुस यानि कविता का उपनाम है |
वह कोई मामूली आदमी नहीं थे | इश्क ए हकीकी ने इस संत की ख्याति को दूर दूर तक फैला दिया था और अंजाम वही होना था जो अक्सर होता आया है | औरंगजेब और साथियों ने इन्हें सूली पर चढा दिया | जब इन्हें कत्लगाह ले जाया जा रहा था तब लोगों की इतनी भीड़ थी कि कंधे से कंधे भी छिलने लगे | संत ने हंसते हंसते मौत को गले लगा लिया | जिसे मालिक की लौ लगी हो उसके लिए ज़मीं और आसमान में कोई फर्क नहीं रह जाता | फिर मौत भला उनका क्या बिगाड़ सकती है |
सरमद ईरान के किसी अरमानी खानदान  से तालुक्क रखते थे | यहूदी और इसाई धर्म के अनुयायी थे मगर बाद में मुसलमान हो गए | सरमद का मतलब होता है –”-हमेशा कायम रहने वाला” , ”मस्त” या ”मालिक के प्रेम में मगन” | उस जमाने में ईरानी सौदागर सिंध होकर हिन्दुस्तान आते थे | सरमद ईरान का माल लेकर हिन्दुस्तान में व्यापार करने आते थे | वहां यह इश्क ए मजाजी के गली कूचों में फंस गए | सिंध के शहरों में ठट्ठा एक मशहूर शहर था | वहीँ से इन्होने व्यापार शरू किया | इन पर प्रेम का ऐसा उन्माद छाया कि अपना व्यापार भी गारत कर लिया | इश्क ए मजाजी ने इन्हें इश्क ए हकीकी की ऊँचाइयों पर ला खड़ा किया |
इनके शरीर पर मात्र ढकने भर को कपड़ा रह गया | हिन्दुस्तान के रेगिस्तान की ख़ाक छानते फिरे | अंत में इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई | बेहूदा चिर दर तलबश मी गरदी |
बिनाशीँ अगर ऊ खुदास्त खुद मी आयद |
मतलब कि उसकी तलाश में फिजूल क्यूँ फिरता है ? अगर वह खुदा है तो खुद आएगा | तू बैठा रह | फिर यह एक ठिकाने की तलाश में लग गए | शाहजहाँ के अंतिम शासन काल में दिल्ली पहुंचे | दाराशिकोह सूफी संतों के भक्त थे |धीरे धीरे सरमद के भक्तों की भीड़ बढ़ने लगी | औरंगजेब के खेमे में खलबली मच गयी | कट्टर मुसलमानों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया | सरमद से वाद विवाद में हारना बड़ा ही मुश्किल था |
आखिर औरंगजेब गद्दी पर बैठा | शाहजहाँ को कैद कर भाइयों को मारने लगा | दाराशिकोह के साथी भी मारे गए |
औरंगजेब ने काजियों को पीछे लगा रखा था | काजी ने उन्हें बिना कपडों के देख कर कहा –फ़कीर यह क्या हरकत है ?
सरमद ने कहा —बाबा क्या करूँ , शैतान कवी ( जबरदस्त ) है | काजी सुन कर चुप रह गया क्यूँकि उसका नाम कवी (  Qavi) था | यानि कि उसीने कपडे उतारे हैं | औरंगजेब ने सभा बुलवाई |
औरंगजेब की सभा में पूछा गया —कि आप कपडे क्यूँ नहीं पहनते हैं ? तब इन्होने जवाब दिया —जिसने तुझे बादशाही का ताज दिया है , उसीने मुझे यह परेशानी का सामान दिया है | जिसको भी उसने दोषों वाला देखा , उसको कपडे पहनाकर दोष ढँक दिए | जिसे उसने निर्दोष पाया , उसे बिना कपडों के रहने दिया |
औरंगजेब और काजी उन्हें क़त्ल करने के लिए जुर्म ढूँढने लगे | सरमद पूरा कलमा नहीं पढ़ते थे | सिर्फ ”ला-इलाह” —मतलब —   ”नहीं है कोई पूज्य” , पढ़ते थे | पूरा कलमा है ”ला इलाह अल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह” | सूफी लोग मुहम्मद रसूल अल्लाह नहीं पढ़ते हैं | वह ” ला इलाह इल अल्लाह” पढ़ते हैं -मतलब कि –”-नहीं है कोई पूज्य सिवा अल्लाह के” |
औरंगजेब के दरबार में इसका कारण पूछा  गया कि आप ”ला -इलाह ” पढ़कर चुप क्यूँ हो जाते हो ? तब उन्होंने कहा कि जो दिल में न हो वह जुबान पर कैसे हो , मैं तो अभी साक्षात्कार की सीमा तक नहीं गया , जिसका मुझे ज्ञान नहीं वह मैं कैसे कहूँ ? मौलवियों ने कहा यह तो कुफ्र है | अगर तौबा न करे तो क़त्ल कर देना चाहिए | पर सरमद मौत से बहुत ऊपर थे |
मौत यह मेरी नहीं मेरी कज़ा की मौत है |
क्यूँ डरूं इससे कि फिर मर कर नहीं मरना मुझे |
आखिर काजी ने उनका जुर्म ढूंढ ही निकला |
सरमद की एक रुबाई है—-

 जिसे मालिक की सत्ता और महत्ता पर विश्वास हो गया ,
वह खुद आकाश से भी महान हो गया |
मुल्ला कहता है कि मुहम्मद आसमान पर खुदा से मिलने गए थे |
सरमद कहता है खुद आसमान मुहम्मद  में समा गया |
लोग कहने लगे कि यह मुहम्मद साहब के मोजिज़े से इनकार करता है — (शरीर समेत आसमान गमन का मौजिज़ा )—इसलिए इस काफिर को सजा ए मौत दी जाये | मौत से एक दिन पहले कुछ लोग जामा मस्जिद के किनारे बैठे शेर गढ़ रहे थे | सरमद आये और हंस कर बोले —  मंसूर  का किसा पुराना पड़  गया , मैं नए सिरे से सूली पर चढ़कर उसे फिर ताज़ा करता हूँ , सूली और रस्सी के मज़मून को फिर चमका कर देखता हूँ | दूसरे  दिन फांसी दी जानी थी — लोगों ने कहा कुछ और सुनाइए —तब सरमद ने पढ़ा — उस शोख ने जो मेरा यार था , मेरा सर शरीर से जुदा कर दिया | अच्छा किया , किस्सा ख़त्म किया , सर दर्द जाता रहा ||
जब उन्हें कत्लगाह ले जाया गया तब इतनी भीड़ थी कि चलना तक मुश्किल था | मानो  किसी की बारात जा रही हो |
सरमद मस्त हालत में बोले –मुझे तेरे प्रेम के अपराध में मारा जा रहा है , तू  भी अटारी पर चढ़कर देख क्या अच्छा तमाशा है | जब जल्द तलवार चमकता हुआ आया तब मुस्कराकर उससे नज़रें मिलायीं और कहा —
तेरे कुर्बान जाऊं |
आ आ तू जिस सूरत में भी आ, मैं तुझे खूब पहचानता हूँ |
इसके बाद उन्होंने हंसते हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी |
बुल -हवस को दर्द ए इश्क होता नहीं |
सोज़ परवाने का मक्खी को नहीं ||
इक जनम में दौलत ए दीदार पाए |
हर किसी को वस्ल का हक मिलता नहीं |
मतलब कि कोई इंसान किसी चीज़ को तीव्र इच्छा से पाना चाहे , परवाने की तरह , तो उसे दर्द का पता नहीं चलता | इश्क के दर्द को मक्खी भला क्या जाने ? इस जन्म में खुदा के दीदार सबसे बड़ी दौलत के बराबर हैं | हर किसी को ऐसा मिलन कहाँ नसीब होता है ?
ref
Nabhakrit bhakt maal 1980 edition

हाफिज़ (Haafiz )

English: The roof of Hafez's tomb (the Hafezie...
English: The roof of Hafez’s tomb (the Hafezieh) in Shiraz. (Photo credit: Wikipedia)
Hafezieh (Tomb of Hafez)
Hafezieh (Tomb of Hafez) (Photo credit: Sepehr Ehsani)
 हाफिज़ का पूरा नाम मुहम्मद शमसुद्दीन था | हाफिज़ इनका  तखल्लुस है | यह ईरान के रहने वाले थे | न सिर्फ ईरान बल्कि बग़दाद और हिन्दुस्तान तक इनकी चर्चा थी | हुमायूँ और जहाँगीर इनके दीवानों में से फालें निकाला करते थे | इनका दिल प्रेम से सरोबार था , इनके शेरों से रस टपकता है | यह पढाई में बहुत तेज़ थे और इन्होने बचपन में ही कुरान याद कर ली थी इसलिए इनका नाम हाफिज़ कहलाता है | मुहम्मद साहब के वचन इन्हें मुंह जबानी याद रहते थे | इन्होने भी कविवर हरिवंशराय बच्चन जी की तरह इश्क ए मजाजी और ज़िन्दगी की शराब को लोगों को पिलाया और इनका प्रेम इश्क ए हकीकी की चरम सीमा  तक पहुँच गया | इन्होने तैमूरी हमला अपनी आँखों से देखा था और इन्हें दुनिया से नफरत सी हो गयी | बाकी का समय यह एकांतवास में काटते थे और उन्हीं पलों को बादशाही से बढ़कर समझते थे | सूफी प्रेमी फकीरों में इनका नाम बड़ी इज्ज़त से लिया जाता है |
हाफिज़ कहते थे कि—तुच्छ धन दौलत के लिए कैसी लडाई ? दुश्मनी का पेड़ उखाड़ फेंको और अमन चैन का  पौधा लगाओ जो कि आगे चलकर मीठा फल दे | इतनी छोटी सी बात भी आज लोग नहीं समझते और आने वाली पीढियों के लिए काँटों के वृक्ष बोते चले जाते हैं | धन की खातिर मनुष्यता को कलंकित करना कहाँ की बुद्धिमानी है ?
हाफिज़ कहते थे कि ” संसार में इस तरह रहो कि अगर तुम किसी के मार्ग की धूल भी बन जाओ तब भी किसी का दिल तुमसे मैला न हो |”
वह कहते थे कि  ” हम सबका गुस्सा सहते हैं , फिर भी खुश रहते हैं क्यूंकि हमारे मजहब में किसी से नाराज़ होना पाप है | ”
औरंगजेब, सबको इनकी किताब पढने के लिए मना करता था पर खुद उसे तकिये के नीचे रखकर सोता था |
एक बार नूरजहाँ का हार चोरी हो  गया | चोर पकड़ने के लिए फाल निकली गयी तो यह शेर निकल कर आया –
 ” कि यह कैसा चोर है जो हथेली पर चिराग लिए खडा है | ”
एक दासी जो कि वहां पर ही चिराग लिए खड़ी थी उसे पकडा गया और हार उसी के पास निकला |
हाफिज़ कहते थे कि यदि तेरा मुर्शीद तुझसे नमाज पढने के आसन या कपडे को शराब से भिगो देने को भी कहे तो वह कर लो | उस पर जरा भी शक मत करना | एक आदमी को इसका मतलब समझ में नहीं आया वह एक फकीर के पास गया कि यह क्या लिखा है ?
फकीर ने उसे कसाई के पास भेज दिया | कसाई ने कहा कि वेश्या के पास जाओ | वह आदमी बड़ा ही घबराया , पर जैसे तैसे करके वहां गया और एक कोने में चुपचाप बैठ गया | एक औरत पलंग पर उदास बैठी थी | उसने उदासी का कारण पूछा तब उस औरत ने बताया कि डाकू मुझे बचपन में फलां फलां जगह से उठाकर ले गए थे और  मुझे बेच दिया , मैं यह काम नहीं करना चाहती हूँ |
तब वह आदमी चौंका कि तू तो मेरी बहन है जिसे बचपन में डाकू उठा कर ले गए थे |
ऐसे होते थे पहले ज़माने के संत और फकीर कि उन्हें सब के दिल का हाल मालूम होता था |
पर इनका रास्ता बड़ा ही विकट होता है –
हाफिज़ कहते थे –अँधेरी रात और दरिया की भयानक लहरें , जो किनारे बैठे हैं वह हमारा हाल क्या जानें | सच के रास्ते पर चलना मौत के रास्ते पर चलने जैसा है | जीते जी मरना पड़ता है और यह सिर्फ अपने अन्दर देखने का साहस करने वाला ही जानता है | उसकी तकलीफ से वो लोग जो कि किनारों पर बैठे हैं बे-खबर हैं |
तैमूर लंग ने हाफिज़ को ” राज कवि” का पद दिया था |
तैमूर लंग और चंगेज़खान में उसी दौर में समझौता हुआ और तैमूर को बुखारा और समरकंद वापिस कर दिए गए थे |
हाफिज़ यह पदवी लेने के लिए वहां नहीं गए और लिखकर भेज दिया कि —
शीराज का पहलवान अगर दिल को हाथ में लाये तो उसके एक एक काले तिल पर समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूँ | इसका मतलब किसी की समझ में नहीं आया | बाद में हाफिज़ ने समझाया कि -इश्क ए हकीकी ( जिसमें लगती दुनिया फीकी) ही सच्चा प्रेम है | शीराज़ में शराब बनती है इसलिए शराब पिलाने वाला पहलवान हुआ | शराब पिलाने वाले से इनका मतलब इश्क ए हकीकी की शराब से था |
यदि मैं अपने मन को जीत लूँ तो अपने खुदा के एक एक तिल पर समरकंद और बुखारा कुर्बान कर दूँ | सच्चे फकीरों और दरवेशों को राज पाट से भला  क्या लेना देना ?
सन ७९१ हिजरी या सन १३८८ ई में शीराज़ में इन्होने अपना शरीर त्यागा | जनाजे के साथ पूरा शहर उमड़ आया था | लोग कहने
लगे कि हाफिज़ काफिर हैं इनके जनाजे पर नमाज नहीं पढ़ी जायेगी | बादशाह ने कहा कि दीवान मंगाया जाए | फाल निकाली गयी , तब यह शेर निकल कर आया —हाफिज़ के जनाजे के साथ जाने से डर मत , अगरचे गुनाह में डूबा है , लेकिन बहिश्त को जायेगा | सब लोग सकते में आ गए | और फिर जनाजे कि नमाज अदा की गयी |
चलते चलते हाफिज़ का एक शेर —
English: Tomb of Hafez in Shiraz
English: Tomb of Hafez in Shiraz (Photo credit: Wikipedia)
आसमां से आती है हर दम आवाज़ |
क्यूँ पड़ा दुनिया में नहीं सुनता उसे ||

‘रहीम’
रहिमन धागा प्रेम का

            भक्तिकालीन हिंदी साहित्य में रहीम का महत्वपूर्ण स्थान है। रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम ख़ानखाना था। ये अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। रहीम, अकबर के अभिभावक बैरम ख़ां के बेटे थे। इनका जन्म 17 सितंबर 1556 ईस्वी को लाहौर में हुआ था। बैरम ख़ां की हत्या के बाद अकबर ने रहीम की मां सुल्ताना बेग़म से निकाह कर लिया था, इस प्रकार रहीम अकबर के सौतेले बेटे बन गए थे। रहीम अकबर के सेनापति भी थे। इन्हें हिन्दी, अरबी, तुर्की, संस्कृत, ब्रज, अवधी आदि कई भाषाओं का ज्ञान था। रहीम बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ये कवियों के आश्रयदाता भी थे। केशव, आसकरन, मंडन, नरहरि और गंग जैसे कवियों ने इनकी प्रशंसा की है। रहीम की दानशीलता प्रसिद्ध है। अकबर के दरबारी कवि गंग के दो छंदों पर प्रसन्न होकर रहीम ने उन्हें 36 लाख रुपये दे दिए थे।
            रहीम के काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम, श्रृंगार आदि के छंदों का समावेश है। इनकी 11 रचनाएं प्राप्य हैं। दोहावली में रहीम के 300 दोहे संग्रहित हैं। 70 वर्ष की उम्र में सन् 1626 ईस्वी में इनका देहावसान हुआ। रहीम का मकबरा दिल्ली में हुमायुं के मकबरे के समीप है।
            प्रस्तुत है, रहीम के कुछ नीति विषयक दोहे-

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय।
रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत,
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।
रहिमन तब लगि ठहरिए, दान  मान   सनमान,
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करहिं पयान।
आब गई आदर  गया,  नैनन  गया सनेह,
ये तीनों तबही गए, जबहि कहा कछु देह।
रहिमन  विपदा  हू  भली,  जो  थोरे  दिन   होय,
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय,
सुन   इठलैहैं  लोग  सब,  बांट  न  लइहैं  कोय।
रूठे  सुजन  मनाइये,  जो  रूठे  सौ   बार,
रहिमन फिर फिर पोहिये, टुटे मुक्ताहार।
चाह  गई  चिंता   मिटी,   मनुआ   बेपरवाह,
जिनको कछु नहिं चाहिये, वे साहन के साह।
 
अनुचित वचन न मानिए, जदपि गुराइस गाढ़ि।
है ‘रहीम’ रघुनाथ तें, सुजस भरत को बाढ़ि।।3॥
अर्थ: ‘‘कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हों उसकी गलत बात नहीं मानिए भले ही वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। भगवान श्री राम ने अपने पिता की बात मानते हुए वनगमन किया पर फिर भी उनसे अधिक यश उस भरत को प्राप्त हुआ जिन्होंने मां की आज्ञा ठुकराकर राज्य त्याग दिया।’’
‘‘अब ‘रहीम’ मुश्किल बढ़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम।।4॥
अर्थ: ‘‘दुनियां में दो महत्वपूर्ण काम एकसाथ करना अत्यंत कठिन है। सच का साथ लो तो जग नहीं मिलता और झूठ बोलो तो परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता।“
8. प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।

रहीम के दोहे

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।

जब मैं था तब हरि‍ नहीं, अब हरि‍ हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

मानुष हौं तो वही रसखानि
कृष्ण भक्त कवि रसखान का जन्म लगभग 1590 विक्रमी में हुआ था। वे दिल्ली में रहते थे। संवत 1613 में उन्हें दिल्ली छोड़नी पड़ी। वे कई वर्ष तक ब्रज और उसके आस-पास के स्थानों में घूमते रहे। संवत 1634 से 1637 तक उन्होंने यमुना तट पर रामकथा सुनी। गोसाईं विट्ठलनाथ से कृष्णभ्क्ति की दीक्षा लेकर कृष्ण लीला गान करने लगे। उन्होंने कृष्ण की लीलाओं पर आधारित अनेक कवित्त, दोहे आदि रचे। कृष्णभक्त कवियों में उनकी प्रसिद्धि फैल गई। संवत 1671 में रसखान ने ‘प्रेमवाटिका‘ की रचना की। उनका देहावसान संवत 1679 में हुआ। प्रस्तुत है उनका एक प्रसिद्ध छंद -
मानुष हौं तो वही रसखानि,
         बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।
जौ पशु हौं तो कहां बसु मेरो,
        चरौं नित नंद को धेनु मझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को,
        जो घर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेर करौं,
        मिलि कालिंदि कूल कदंब की डारन।
या लकुटी अरु कामरिया पर,
        राज तिहूं पुर को तजि डारौं।
आठहुं सिद्धि नवौ निधि कौ सुख,
        नंद की गाइ चराइ बिसारौं।
आंखिन सौं रसखानि कबौं,
        ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हूं कलधौत के धाम,
        करील की कुंजन उपर वारौं।


YARI SHAB
Wo hindu or turak se nyara hai..
Soi daras nijj (apna) paayo…
Aaye na jaye mare na jivee….(wo marta or jeeta nahi hai…
NIRANKAAR ISHWAR
AVINASI PER DRISTHI
PAYO VISRAM
AATAM (AATMA-APNA AAPA, KHUD, SWAYM) PUJOO
JAA MAIN HUM SO HUM MAAIN (JO HUMARE ANDAR HAI OR JISMAIN HUM HAI)
KEET SE BHRAM HO JAAYE..(ISHWAR HO JATA HAI.)
AANA JAANA MARNA NAHI HAI (AATMA AATI JAATI OR MARTI NAHI HAI.)
AAPE MAIN AAPE KO DEKHNA…(APNE MAIN HI AATMA PARMATMA, KHUDA KO DEKHNA)

TAJ
HINDU HO REHUNGI MAIN…
NAJEER
नज़ीर अकबराबादी 
 जब आशिक मस्त फकीर हुए

सूफीमत के शायरों में नज़ीर अकबराबादी का नाम प्रसिद्ध है। ये ग़ालिब और मीर के समकालीन थे। इनका जन्म सन् 1735 में दिल्ली में हुआ था। बाद में ये आगरे में बस गए थे। नवाब वाजिद अली शाह इन्हें दरबारी कवि बनाना चाहते थे लेकिन नज़ीर ने इंकार कर दिया। इन्हें अवधी, ब्रज, मारवाड़ी, पंजाबी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान था। कृष्ण की लीलाओं पर आधारित इनकी रचनाएं बहुत प्रसिद्ध हैं। इनका देहावसान सन् 1830 में हुआ।
मानवता को एकमात्र धर्म मानने वाले सूफीमत के कवि परमात्मा और स्वयं के रिश्ते को आशिक और माशूक का रिश्ता मानते हैं। प्रस्तुत है महान सूफी शायर नज़ीर अकबराबादी की एक महान रचना-

है आशिक और माशूक जहां, वां शाह वज़ीरी है बाबा,
नै रोना है नै धोना है, नै दर्द असीरी है बाबा ।
दिन रात बहारें चुहले हैं, औ ऐश सफीरी है बाबा,
जो आशिक हुए सो जाने है, यह भेद फ़कीरी है बाबा।
हर आन हंसी हर आन खुशी, हर वक्त अमीरी है बाबा,
जब आशिक मस्त फ़कीर हुए, फिर क्या दिलगीरी है बाबा।
कुछ ज़ुल्म नहीं कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद नहीं फरियाद नहीं,
कुछ क़ैद नहीं कुछ बंद नहीं, कुछ जब्र नहीं आज़ाद नहीं।
शागिर्द नहीं उस्ताद नहीं, वीरान नहीं आबाद नहीं,
है जितनी बातें दुनिया की, सब भूल गए कुछ याद नहीं।
जिस सिम्त नज़र कर देखे हैं, उस दिलवर की फुलवारी है,
कहीं सब्ज़ी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलक्यारी है।
दिन रात मगन ख़ुश बैठे हैं, और आस उसी की भारी है,
बस आप ही वो दातारी हैं, और आप ही वो भंडारी हैं।
हम चाकर जिसके हुस्न के हैं, वह दिलबर सबसे आला है,
उसने ही हमको जी बख़्शा, उसने ही हमको पाला है ।
दिल अपना भोला भाला है, और इश्क बड़ा मतवाला है,
क्या कहिए और नज़ीर आगे, अब कौन समझने वाला है।
हर आन हंसी हर आन ख़ुशी, हर वक़्त अमीरी है बाबा,
जब आशिक मस्त फकीर हुए , फिर क्या दिलगीरी है बाबा।

KARE KHAAN
और कारे बेग तो श्री कृष्ण पर इस प्रकार से दावा जताते हैं

एहौं रनधीर बलभद्र जी के वीर अब,
हरौ मेरी पीर क्या, हमारी बेर-बार की।
हिंदुन के नाथ हो तो हमारा कुछ दावा नहीं,
जगत के नाथ हो तो मेरी सुध लिजिए॥
KARIMBHAKSH
SIDHE SE BHATKYO (सीधे से भटकायो )
VIRAH
ना मैं मुल्ला ना मैं काजी

संत बुल्लेशाह

                                       लाहौर जिले के पंडील गांव में विक्रम संवत 1737 में संत बुल्लेशाह का जन्म हुआ। इनके पिता शाह मुहम्मद दरवेश अरबी तथा फारसी भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे। बुल्लेशाह पहले साधु दर्शनीनाथ के संपर्क में रहे और फिर इनायत शाह के संपर्क में आ गए। ये आजीवन ब्रह्मचारी रहे और कुसूर नामक स्थान में निवास करते हुए सदैव अपनी साधना में लीन रहे। इस्लाम और सूफी धर्म -शिक्षा, धर्म-ग्रंथों के व्यापक और गहन अध्ययन से बुल्लेशाह में जहां गहन संस्कारों का प्रभाव पड़ा, वहां परमात्मा को पाने की अपूर्व लौ भी लग गई।
                                     संत बुल्लेशाह की विचारधारा, सूफीमत की ही भांति, वेदांत से भी बहुत कुछ प्रभावित थी। कबीर साहब के समान विचार की स्वतंत्रता में इनकी आस्था थी। उन्ही की भांति ये बाह्याडंबर के कट्टर विरोधी थे। इनकी धारणा थी कि मंदिर -मस्जिद में प्रेमरूपी परमात्मा का निवास होना असंभव है। इनके अनुसार सरलहृदय होना तथा अहंकार का परित्याग सबसे अधिक आवश्यक है। ये अपना काफिर होना स्वीकार करते थे। इनका देहावसान विक्रम संवत 1810 में हुआ। कसूर के निकट पांडोके नामक गांव में इनकी मजार है जहां प्रतिवर्ष उर्स लगता है।

प्रस्तुत है, संत बुल्लेशाह का एक पद-

टुक बूझ कौन छप आया है।
इक नुकते में जो फेर पड़ा, तब ऐन गैन का नाम धरा।
जब मुरसिद नुकता दूर कियो, तब ऐनो ऐन कहाया है।
तुसीं इल्म किताबा पढ़दे हो, केहे उलटे माने करते हो।
वे मुजब ऐबें लड़दे हो, केहा उलटा बेद पढ़ाया है।
दुइ दूर करो कोई सोर नहीं, हिंदू तुरक कोई होर नहीं।
सब साधु लखो कोइ चोर नहीं, घट घट में आप समाया है।
ना मैं मुल्ला ना मैं काजी, ना मैं सुन्नी ना मैं हाजी।
बुल्लेशाह नाल जाइ बाजे, अनहद सबद बजाया है।

भावार्थ-
जरा देखो, अगोचर वेश में कौन आया है। जिस प्रकार अरबी के एक अक्षर ऐन में एक नुकता या बिंदु लगा देने से वह गैन बन जाता है, उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा भी केवल नाम-रूप की उपाधि के कारण सीमित जान पड़ता है। सतगुरु ने यह भ्रम दूर किया। तुम ज्ञान और धर्मशास्त्र की किताबें पढ़ते हो और उलटे अर्थ लगाकर आपस में लड़ते हो। हिंदू और तुर्क भिन्न नहीं हैं
, दोनों में परमात्मा का वास है। इसलिए सभी साधु हैं। मैं मुल्ला, काजी, सुन्नी या हाजी नहीं हूं। बुल्लेशाह कहते हैं कि मेरे निकट तो केवल उस परमात्मा का अनहद नाद ही सुनाई देता है।

JO LEELAT MAIN LIKHA WO HI HOGA..

संत दीन दरवेश


सूफी संत दीन दरवेश के जन्मकाल के संबंध में कोई पुष्ट जानकारी नहीं मिलती। एक मत के अनुसार इनका जन्म विक्रम संवत 1810 में उदयपुर के निकट गुड़वी या कैलाशपुरी नामक ग्राम में हुआ था। दूसरे मत के अनुसार इनका जन्म गुजरात के डभोड़ा नामक ग्राम में वि.सं. 1867 में हुआ था।
अपने गुरु अतीत बालनाथ से दीक्षित होने के पूर्व ये अनेक हिंदू तथा मुस्लिम विद्वानों से मिल चुके थे और प्रसिद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुके थे। यही कारण है कि इनके काव्य में सूफीवाद तथा वेदांत दर्शन के अतिरिक्त अन्य सम्प्रदायों की विचारधारा का प्रभाव परिलक्षित होता है।
कहते हैं कि दीन दरवेश ने अपने हृदय के पावन उद्गारों को व्यक्त करते हुए सवा लाख कुंडलियों की रचना कर ली थी किंतु उनकी अधिकांश रचनाएँ अप्राप्य हैं। इनकी कुंडलियों का एक लघु संग्रह वि.सं. 2008 में गुजराती लिपि में अहमदाबाद से प्रकाशित हुआ था। इनके काव्य के प्रमुख विषय माया, ईश्वर प्रेम, सहज जीवन, विश्वप्रेम, परोपकार आदि हैं।
संवत 1910 में चंबल नदी में स्नान करते समय डूब जाने से इनका देहावसान हुआ था।

प्रस्तुत है, संत दीन दरवेश की 3 कुंडलियां-

1.
माया माया करत है, खाया खर्च्या नाहिं,
आया जैसा जाएगा, ज्यूँ बादल की छाँहिं।
ज्यूँ बादल की छाँहि, जायगा आया जैसा,
जान्या नहिं जगदीस, प्रीत कर जोड़ा पैसा।
कहत दीन दरवेश, नहीं है अम्मर काया।
खाया खर्च्या नाहिं, करत है माया माया।
2.
बंदा कहता मैं करूँ, करणहार करतार,
तेरा कहा सो होय नहिं, होसी होवणहार।
होसी होवणहार, बोझ नर बृथा उठावे,
जो बिधि लिखा लिलार, तुरत वैसा फल पावे।
कहत दीन दरवेश, हुकुम से पान हलंदा,
करणहार करतार, तुसी क्या करसी बंदा।
3.
सुंदर काया छीन की, मानो क्षणभंगूर,
देखत ही उड़ जायगा, ज्यूँ उडि़ जात कपूर।
ज्यूँ उडि़ जात कपूर, यही तन दुर्लभ जाना,
मुक्ति पदारथ काज, देव नरतनहिं बखाना।
कहत दीन दरवेश, संत दरस जिन पाया,
क्षणभंगुर संसार, सुफल भइ सुंदर काया।


MAIN NAHI MARTA…..

सूफी संत मंसूर
सन् 858 ई. में ईरान में जन्मे सूफी संत मंसूर एक आध्यात्मिक विचारक, क्रांतिकारी लेखक और सूफी मत के पवित्र गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनका पूरा नाम मंसूर अल हलाज था।
इनके पिता का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। बालक मंसूर पर इसका व्यापक असर हुआ। सांसारिक माया-मोह के प्रति ये विरक्त थे। इन्होंने सूफी महात्मा जुनैद बगदादी से आध्यात्म की शिक्षा ग्रहण की। बाद में अमर अल मक्की और साही अल तुस्तारी भी मंसूर के गुरु हुए।
मंसूर ने देश-विदेश की यात्राएं की। इस दौरान उन्होंने भारत और मध्य एशिया के अन्य देशों का भ्रमण किया। वे एक वर्ष तक मक्का में रहकर आध्यात्मिक चिंतन करते रहे। इसके बाद उन्होंने एक क्रांतिकारी वाक्य का उच्चारण करना शुरू कर दिया-
‘अनल हक‘, अर्थात, मैं सत्य हूं, और फिर बार-बार इस वाक्य को दुहराते रहे। ईरान के शासक ने समझा कि मंसूर स्वयं को परमात्मा कह रहा है । इसे गंभीर अपराध माना गया और उन्हें 11 वर्ष कैद की सजा दे दी गई। 

अनलहक

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मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
अनलहक सूफियों की एक इत्तला (सूचना) है जिसके द्वारा वे आत्मा को परमात्मा की स्थिति में लय कर देते है। सूफियों के यहाँ खुदा तक पहुँचने के चार दर्जे है। जो व्यक्ति सूफियों के विचार को मानता है उसे पहले दर्जे क्रमश: चलना पड़ता है - शरीयत, तरीकत मारफत और हकीकत। पहले सोपान में नमाज, रोजा और दूसरे कामों पर अमल करना होता है। दूसरे सोपान में उसे एक पीर की जरूरत पड़ती है-पीर से प्यार करने की और पीर का कहा मानने की। फिर तरीकत की राह में उसका मस्तिष्क आलोकित हो जाता है और उसका ज्ञान बढ़ जाता है; मनुष्य ज्ञानी हो जाता है (मारफत) । अंतिम सोपान पर वह सत्य की प्राप्ति कर लेता है और खुद को खुदा में फना कर देता हैं। फिर 'दुई' का का भाव मिट जाता है,'मैं' और 'तुम' में अंतर नहीं रह जाता। जो अपने को नहीं सँभाल पाते वें 'अनलहक' अर्थात्‌ 'मैं खुदा हूँ' पुकार उठते हैं। इस प्रकार का पहला व्यक्ति जिसने 'अनलहक' का नारा दिया वह मंसूर-बिन-हल्लाज था। इस अधीरता का परिणाम प्राणदंड हुआ। मुल्लाओं ने उसे खुदाई का दावेदार समझा और सूली पर लटका दिया।

 


अनल हक कहने का मंसूर का आशय यह था कि जीव और परमात्मा में अभेद है। यह विचार हमारे उपनिषदों का एक सूत्र- अहं ब्रह्मास्मि के समान है।
सच बोलने वालों को नादान दुनियावी लोगों ने सदैव मौत की सजा दी है। सुकरात से रजनीश तक, सब की एक ही कहानी है। 26 मार्च, 922 ई. को संत मंसूर को अत्यंत क्रूर तरीके से अपार जन समुदाय के सामने मृत्युदण्ड दे दिया गया। पहले उनके पैर काटे गए, फिर हाथ और अंत में सिर। इस दौरान संत मंसूर निरंतर मुस्कुराते रहे, मानो कह रहे हों कि परमात्मा से मेरे मिलने की राह को काट सकते हो तो काटो।
मंसूर की आध्यात्मिक रचनाएं ‘किताब-अल-तवासीन‘ नामक पुस्तक में संकलित हैं।
प्रस्तुत है, संत मंसूर की एक आध्यात्मिक ग़ज़ल। यह रचना उर्दू में है। संत मंसूर उर्दू नहीं जानते थे इसलिए यह ग़ज़ल प्रत्यक्ष रूप से उनके द्वारा रचित नहीं हो सकती। संभव है, उनके किसी हिंदुस्तानी अनुयायी ने उनकी फ़ारसी रचना को उर्दू में अनुवाद किया हो। चूंकि ग़ज़ल में अनल हक और मक्ते में मंसूर आया है इसलिए इसे मंसूर रचित ग़ज़ल का उर्दू अनुवाद माना जा सकता है। बहरहाल, प्रस्तुत है, ये आध्यात्मिक ग़ज़ल-

अगर है शौक मिलने का, तो हरदम लौ लगाता जा,
जलाकर ख़ुदनुमाई को, भसम तन पर लगाता जा।
पकड़कर इश्क की झाड़ू, सफा कर हिज्र-ए-दिल को,
दुई की धूल को लेकर, मुसल्ले पर उड़ाता जा।
मुसल्ला छोड़, तसवी तोड़, किताबें डाल पानी में,
पकड़ तू दस्त फरिश्तों का, गुलाम उनका कहाता जा।
न मर भूखा, न रख रोज़ा, न जा मस्जिद, न कर सज्दा,
वजू का  तोड़  दे  कूजा, शराबे  शौक  पीता  जा।
हमेशा खा, हमेशा पी, न गफलत से रहो एकदम
नशे में सैर कर अपनी, ख़ुदी को तू जलाता जा।
न हो मुल्ला, न हो बह्मन, दुई की छोड़कर पूजा,
हुकुम शाहे कलंदर का, अनल हक तू कहाता जा।
कहे ‘मंसूर‘ मस्ताना, ये मैंने दिल में पहचाना,
वही मस्तों का मयख़ाना, उसी के बीच आता जा।

SAANWARIYA MAN BHAYO RE..WO SAB MAIN HI SAMAYA HAI…
गोरी सोवत सेज पर

अमीर खुसरो

                दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली भाषा को सबसे पहले हिंदवी नाम देने वाले प्रसिद्ध सूफी कवि अमीर खुसरो का जन्म सन 1253 ई. में उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले के पटियाली कस्बे में हुआ था। इनके पिता का नाम सैफुद्दीन मुहम्मद तथा माता का नाम दौलत नाज़ था। खुसरो का नाना हिंदू था जिसने  बाद में मुस्लिम धर्म अपना लिया था। सात वर्ष की उम्र में खुसरो के पिता का देहांत हो गया था। प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया से खुसरो ने दीक्षा ली थी।
                खुसरो 20 वर्ष की उम्र में एक कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। वह गयासुद्दीन तुगलक के दरबारी कवि थे। उसके बाद छह वर्षों तक ये जलालुद्दीन खिलजी और उसके पुत्र अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रहे। अलाउद्दीन ने जब चित्तौड़गढ़ के राजा रत्नसेन की रानी को पाना चाहा तो पद्मिनी ने जौहर कर प्राणोत्सर्ग कर दिया। इस घटना का कविहृदय खुसरो पर गंभीर प्रभाव पड़ा। वे हिंद की संस्कृति से और अधिक जुड़ गए। उन्होंने माना कि हिंदवासियों के दिल में रहने के लिए हिंदवी सीखनी होगी। 
                अमीर खुसरो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक महान सूफी संत, कवि, राजनीतिज्ञ, भाषाविद्, इतिहासकार, संगीतज्ञ, गायक, ज्योतिषी,तथा योद्धा भी थे। इन्हें तबला का आविष्कारक माना जाता है। खयाल और कव्वाली गायन शैली खुसरो की ही देन है। इनके लिखे दोहे, मुरकियां तथा पहेलियां प्रसिद्ध हैं। खुसरो की लिखी 99 पुस्तकों का उल्लेख है जिनमें से केवल 22 प्राप्य हैं। हिंदी में लिखी 3 पुस्तकों में से केवल खालिकबारी ही उपलब्ध है।
                जब खुसरो के गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया का निधन हुआ तब खुसरो को वैराग्य हो गया। वे अपने गुरु की समाधि के निकट कभी न उठने का निश्चय करके बैठ गए। वहीं उन्होंने सन् 1325 ई. में यह अंतिम दोहा कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए-
                गोरी सोवत सेज पर, मुख पर डारे केस,
                चल खुसरो घर आपनो, रैन भई चहुं देस।

प्रस्तुत है खुसरो की एक प्रसिद्ध रचना-

                काहे को ब्याहे बिदेस,
                अरे लखिया बाबुल मोरे,
                काहे को ब्याहे बिदेस।
                भइया को दिए बाबुल महल दुमहले,
                हमको दिए परदेस।
                हम तो बाबुल तोरे खूंटे की गइया,
                जित हांके तित जइहें।
                हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियां,
                घर घर मांगे है जइहैं।
                कोठे तले से जो पलकिया निकली,
                बीरन भए खाए पछाड़।
                तारों भरी मैंने  गुड़िया जो छोड़ी,
                छूटा सहेली का साथ।
                डोली का परदा उठा के जो देखा,
                आया पिया का देस।-------



स्वामी रामतीर्थ।

‘मेरे लिए तो वृक्ष की छाया मकान का काम दे सकती है,राख मेरी पोशाक का, सूखी धरती मेरे बिस्तर का और दो-चार घरों से मांगी रोटी मेरे भोजन का।‘
उक्त बातें मिशन कॉलेज लाहौर के गणित के एक प्रोफेसर ने सन् 1896 में एक पत्र में लिखी थी। ....कौन थे वे ?
एक बार उनका नाम प्रांतीय सिविल सेवा के लिए प्रस्तावित किया गया तो उन्होंने अस्वीकार कर दिया। नौकरी छोड़कर उर्दू में ‘अलिफ‘ नाम की पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। विभिन्न तीर्थों की यात्राएं कीं। भारतीय और पाश्चात्य दर्शन ग्रंथों का अध्ययन किया। द्वारकापीठ के शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए।
........कौन थे वे ?
सन् 1900 ई. में तीर्थयात्रा के दौरान अपने पास की सारी संपत्ति गंगा में बहा दी।
पत्नी को परिजनों के सहारे छोड़कर सन्यास ग्रहण किया और हिमालय की शरण में चले गए। सर्वधर्म सम्मेलन में व्याख्यान देने अमेरिका और जापान की यात्राएं कीं।.....कौन थे वे ?
अनेक लेखों-व्याख्यानों के अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी में 100 और उर्दू में 150 कविताएं लिखीं। संयोग देखिए- 22 अक्टूबर, 1873 ई. को दीपावली के दिन पंजाब के गुजरांवाला जिले के मुरारीवाला गांव में उनका जन्म हुआ और 17 अक्टूबर, 1906 ई. को दीपावली के ही दिन मात्र 33 वर्ष की आयु में उन्होंने गंगा में जल समाधि ग्रहण कर ली।......कौन थे वे ?
वे महान विभूति थे- प्रसिद्ध विद्वान, संत, दार्शनिक, गणितज्ञ, और कवि स्वामी रामतीर्थ।

प्रस्तुत है, उर्दू में उनकी एक दार्शनिक भावों वाली कविता-

जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का, हर चार तरफ आबादी है।
हर रात नई इक शादी है, हर रोज मुबारकबादी है।
ख़ुश ख़ंदा है रंगा गुल का, ख़ुश शादी शाह मुरादी है।
बन सूरज आप दरफ़्शां है, ख़ुद जंगल है,ख़ुद वादी है।
नित राहत है, नित फ़र्हत है, नित रंग नए, आजादी है।

हर रग रेशे में हर मू में, अमृत भर-भर भरपूर हुआ।
सब कुल्फ़त दूरी दूर हुई, मन शादी मर्ग से चूर हुआ।
हर बर्ग बधाइयां देता है, हर जर्रा-जर्रा तूर हुआ।
जो है सो है अपना मजहर, ख़्वाह आबी नारी बादी है।
क्या ठंडक है, क्या राहत है, क्या शादी है, आजादी है।

रिमझिम रिमझिम आंसू बरसें, यह अब्र बहारें देता है।
क्या खूब मजे की बारिश में, वह लुत्फ़ वस्ल का लेता है।
किश्ती मौजों में डूबे हैं, बदमस्त उसे कब खेता है।
यह गर्क़ाबी है जी उठना, मत झिझको उफ बरबादी है।
क्या ठंडक है क्या राहत है, क्या शादी है, आजादी है।

मातम, रंजूरी, बीमारी, गलती, कमजोरी, नादारी।
ठोकर ऊंचा नीचा मिहनत, जाती है इन पर जां वारी।
इन सब की मददों के बाइस, चश्मा मस्ती का है जारी।
गुम शीर की शीरीं तूफों में, कोह और तेशा फरहादी है।
क्या ठंडक है क्या राहत है, क्या शादी है, आजादी है।

इस मरने में क्या लज़्ज़त है, जिस मुंह की चाट लगे इसकी।
थूके हैं शाहंशाही पर, सब नेमत दौलत हो फीकी।
मय चहिए दिल सिर दे फूंको,और आग जलाओ भट्ठी की।
क्या सस्ता बादा बिकता है, ले लो का शोर मुनादी है।
क्या ठंडक है क्या राहत है, क्या शादी है, आजादी है।

दिन शब का झगड़ा न देखा, गो सूरज का चिट्ठा सिर है।
जब खुलती दीद-ए-रौशन है,हंगामा-ए-ख़्वाब कहां फिर है।
आनंद सरूर समंदर है, जिसका आगाज़ न आख़िर है।
सब राम पसारा दुनिया का, जादूगर की उस्तादी है।
नित राहत है नित फ़र्हत है, नित रंग नए, आजादी है।
I have no scruple of change, nor fear of death,
Nor was I ever born,
Nor had I parents.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I cause no misery, nor am I miserable;
I have no enemy, nor am I enemy.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am without form, without limit,
Beyond space, beyond time,
I am in everything, everything is in me.
I am the bliss of the universe,
Everywhere am I.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am without body or change of the body,
I am neither senses, nor object of the senses,
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am neither sin, nor virtue,
Nor temple, nor worship
Nor pilgrimage, nor books.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

                                                                             —Rama




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Sunil Dutt Vashistha
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